Govardhan Puja Katha and Pujan Vidhi

दीपावली के दुसरे दिन गोवर्धन पूजा की जाती है। लोग इसे अन्नकूट के नाम से भी जानते हैं। इस त्यौहार का हिन्दू धर्म में काफी महत्व है। इस पर्व में प्रकृति के साथ मानव का सीधा सम्बन्ध दिखाई देता है। गोवर्धन की पूजा भगवान कृष्ण के अवतार के बाद द्वापर युग से शुरू हुई।

Govardhan Puja 2018 Date – 8th November, Thursday

गोवर्धन पूजा में गोधन यानी गायों की पूजा की जाती है। भारत एक कृषि-प्रधान देश है और कृषि ही हमेशा से भारत की आय का मुख्य स्रोत रहा है और गाय किसान की सबसे अच्छी साथी है।प्राचीन काल में गाय के बिना किसान कृषि नहीं कर पता था । प्राचीन भारत में गाय समृद्धि का प्रतीक मानी जाती थी। युद्ध के दौरान स्वर्ण, आभूषणों के साथ गायों को भी लूट लिया जाता था। जिस राज्य में जितनी गाएं होती थीं उसको उतना ही संपन्न माना जाता है।

लोग इसे अन्नकूट के नाम से भी जानते हैं। एक कहावत है- “जैसा खावे अन्न, वैसा होवे मन।” हम जो भोजन करते हैं उससे हमारा शरीर बनता है। शास्त्रों में वर्णन है की भोजन के साथ भाव का भी महत्व है, क्योंकि इससे खाने वाले का मन तुष्ट होता है। कौन किस भावना के साथ भोजन बनता है , किस भाव और दुलार के साथ खिलाता है , मनुष्य किस वातावरण में भोजन ग्रहण करता है, आदि बातों का सीधा प्रभाव मन पर पड़ता है |

गोवर्धन पूजा की कथा

एक बार प्रभु श्री कृष्ण ने बड़े भोलेपन से अपनी माता यशोदा से प्रश्न किया ” माँ ये आप लोग किनकी पूजा की तैयारी कर रहे हैं ” कृष्ण की बातें सुनकर यशोदा बोली बेटा हम देवराज इन्द्र की पूजा के लिए अन्नकूट की तैयारी कर रहे हैं। माँ यशोदा के ऐसा कहने पर श्री कृष्ण बोले माँ हम इन्द्र देव की पूजा क्यों करते हैं? यशोदा ने कहा वह वर्षा करते हैं जिससे अन्न की पैदावार होती है उनसे हमारी गायों को
चारा मिलता है। तब श्रीकृष्ण बोले- इंद्र में क्या शक्ति है? उससे अधिक शक्तिशाली तो हमारा गोवर्धन पर्वत है। इसी के कारण वर्षा होती है। हमें इंद्र से भी बलवान गोवर्धन की ही पूजा करना चाहिए।

मनुष्य अपनी इच्छाएं पूरी करने के लिए कर्म करता है और उसे कर्म को करने के लिए जो सबसे जरूरी है वो है निरोगी काया| इस प्रकार भगवान श्रीकृष्ण के वाक-जाल में फंसकर ब्रज में इन्द्र के स्थान पर गोवर्धन की पूजा की तैयारियां शुरू हो गईं। पूरा ब्रिज मिष्ठान्न पकवान लाकर गोवर्धन की तलहटी में श्रीकृष्ण द्वारा बताई विधि से गोवर्धन पूजा करने लगे। इस बात पर इंद्र को बहुत क्रोध आया। इंद्र ने अपने मेघों को आज्ञा दी कि वे गोकुल में जाकर मूसलधार बारिश करें। वर्षा से भयभीत होकर सभी लोग श्रीकृष्ण की शरण में गए और रक्षा की प्रार्थना करने लगे। बृजवासियों की पुकार सुनकर श्रीकृष्ण बोले- तुम सब गोवर्धन-पर्वत की शरण में चलो। वह सब की रक्षा करेंगे। सब बृजवासी पशुधन सहित गोवर्धन की शरण में चले गए | श्रीकृष्ण ने गोवर्धन को अपनी उंगली पर उठाकर सब लोगो को उस के नीचे
शरण दी |

गोवर्धन पूजन विधि

इस दिन संध्या काल में गाय के गोबर से गोवर्धन बनाया जाता है और धूप, दीप, नैवेद्य, जल, फल, फूल, खील, बताशे आदि से उस की पूजा की जाती है ।

पूजा के बाद गोवर्धनजी के सात परिक्रमाएं उनका ध्यान लगते हुए लगाई जाती हैं। परिक्रमा के समय एक व्यक्ति हाथ में जल का लोटा व अन्य खील (जौ) लेकर चलते हैं।

गोवर्धनजी गोबर से लेटे हुए पुरुष के रूप में बनाए जाते हैं। इनकी नाभि के स्थान पर एक कटोरी या मिट्टी का दीपक रख दिया जाता है। फिर इसमें दूध, दही, गंगाजल, शहद, बताशे आदि पूजा करते समय डाल दिए जाते हैं और बाद में इसे प्रसाद के रूप में बांट देते हैं।
इस दिन दस्तकार और कल-कारखानों में कार्य करने वाले कारीगर भगवान विश्वकर्मा की पूजा भी करते हैं। इस दिन सभी कल-कारखाने तो पूर्णत: बंद रहते ही हैं, घर पर कुटीर उद्योग चलाने वाले कारीगर भी काम नहीं करते। भगवान विश्वकर्मा और मशीनों एवं उपकरणों का दोपहर के समय पूजन किया जाता है।

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